भारत-ईरान रुपया आधारित भुगतान सिस्टम क्या है?

भारत और ईरान ने कच्चे तेल के आयात के लिए एक समझौता किया है जिसका भुगतान रुपया-आधारित होगा. सामान्य तौर पर अंतरराष्ट्रीय व्यापार में लेन-देन की करेंसी डॉलर होती है.

समाचार एजेंसी रॉयटर्स का कहना है कि भारत और ईरान सरकार ने तेल के आयात का भुगतान रुपये में किए जाने को लेकर 2 नवंबर, 2018 को एक समझौते पर हस्ताक्षर किया है जिसमें 50 प्रतिशत फंड को निर्यात के लिए इस्तेमाल करने का प्रावधान है.

समाचार एजेंसी ने एक सरकारी दस्तावेज़ के हवाले से बताया है कि पहले भारत और ईरान के बीच जो समझौता था उसके तहत 45 प्रतिशत भुगतान रुपये में होता था जबकि 55 फ़ीसद यूरो में.

तो सवाल है भारत और ईरान में भुगतान की जो रुपया-आधारित प्रक्रिया तय हुई है वो है क्या ?

साधारण शब्दों में ये एक तरह का ‘बार्टर सिस्टम’ है, यानी आपको कोई व्यक्ति एक चीज़ बेच रहा है, लेकिन आप उसके बदले पैसे नहीं दे रहे बल्कि सामान दे रहे हैं.

ऐसी प्रथा एक समय गावों में बहुत प्रचलित हुआ करती थी.

विदेशी मुद्रा के क्षेत्र में काम करने वाली कंपनी ई-फ़ारेक्स इंडिया के मैनेजिंग डायरेक्टर सौम्य दत्ता इसे ‘हाफ़-बार्टर सिस्टम’ कहते हैं. वजह ये है कि इस व्यवस्था में एक खा़स बैंक के माध्यम से लेन-देन का काम होगा मगर उसके लिए एक अलग व्यवस्था तैयार की गई है.

कैसे काम करेगा सिस्टम?

चावल निर्यातकों के संघ के अध्यक्ष विजय सेतिया दोनों देशों के बीच तय हुई व्यवस्था को कुछ इस तरह समझाते हैं. वो कहते हैं कि भारत जब ईरान से तेल ख़रीदेगा तो उसका भुगतान रुपये में एक ख़ास बैंक के एकाउंट में डाल दिया जाएगा.

ईरान का वो पैसा भारत के बैंक में पड़ा रहेगा. इस बीच जब किसी ईरानी ख़रीदार को भारत से कोई चीज़ ख़रीदनी है – मान लें चावल- तो भारतीय निर्यातक उसे वो सप्लाई कर देगा और फिर ईरान से इस मामले में भेजे गए निर्देश के मुताबिक़ भारतीय बैंक निर्यातक को उसका पेमेंट यहीं कर देगा. इस काम के लिए भारत ने यूको बैंक को चुना है.

इस व्यवस्था की ज़रूरत क्यों पड़ी?

अमरीका ने ईरान पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए हैं. अमरीकी पाबंदी के तहत दूसरे देशों और कंपनियों पर भी ईरान के साथ व्यापार करने से रोक लगा दी गई है.

अमरीका ने भारत को कच्चे तेल के आयात और कुछ वस्तुओं के व्यापार की छूट दी है. लेकिन ईरान के साथ कोई भी व्यापार डॉलर में नहीं किया जा सकता है, इसलिए भारत ने ये व्यवस्था तैयार की है.

सौम्य दत्ता कहते हैं, “भारत के लिए ईरान से तेल ख़रीदना बहुत फ़ायदे का सौदा है. ईरान न सिर्फ माल बंदरगाह पर डिलीवर करता है बल्कि भारत को दो माह के उधार की भी सुविधा हासिल है.”

विजय सेतिया का कहना है कि ये व्यवस्था अगर लागू न हो पाती तो भारतीय निर्यातकों को बड़ी दिक्क़तों का सामना करना पड़ता. ऐसे में जो निर्यातक ईरान के बाज़ारों पर निर्भर हैं उनके माल की बाज़ार में मांग ही नहीं रहती.

https://www.bbc.com/hindi/international-46481407